आजदी की लड़ाई की तरह था संविधान बचाने का संघर्ष...

आजदी की लड़ाई की तरह था संविधान बचाने का संघर्ष...

- संविधान दिवस(26 नवम्बर) पर विशेष

रायबरेली, 26 नवम्बर(हि.स.)। 71 साल पहले 26 नवम्बर 1949 को भारत को अपना संविधान मिला था। आजादी के पहले इसको पाने के लिए जहां कठिन संघर्ष और लम्बी लड़ाई लड़ी गई, वहीं आजादी के बाद भी संविधान की रक्षा के लिये लोगों को संघर्ष का रास्ता चुनना पड़ा। 5 साल पूर्व 26 नवम्बर 2015 को संविधान दिवस मनाने की परम्परा शुरू हुई। जून 1975 से मार्च 1977 तक 21 महीने का समय भारत में संविधान के लिये संकट का समय रहा,जिसकी रक्षा के लिए लोगों को अपना सर्वस्व न्योछावर करना पड़ा।

संविधान दिवस पर हिन्दुस्थान समाचार से ऐसे ही कई संविधान के रक्षकों ने अपने विचार साझा किया। आपातकाल में कई महीने जेल में रहे पूर्व मंत्री गिरीश नारायण पांडे कहते हैं अपना संविधान और उसकी क्या अहमियत जीवन में होती है उसका एहसास तब हुआ जब आधी रात को उनको घर से जबरन उठाया गया। यहां तक कि 15 दिन तक घर वालों को पता ही नहीं चला कि वह कहां हैं। संविधान का गला घोंटकर काम किये जा रहे थे।

पूर्व मंत्री के अनुसार संविधान को दबाने का असर लोगों तक हो रहा था, पूरा देश एक जेल बन चुका था। बावजूद इसके पूरा देश एक स्वर में उठ खड़ा हुआ और अपने संविधान की रक्षा के लिये सारी यातनाएं झेली और अंत में सरकार को झुकना पड़ा। गिरीश नारायण पांडे के अनुसार इसी संघर्ष की बदौलत हम अपने संविधान की रक्षा कर सकें।

वरिष्ठ पत्रकार और लोकतंत्र सेनानी केबी सिंह का कहना है कि देश की स्वंत्रता का आधार हमारा संविधान है और जब भी इस पर संकट आता है तो वह हमारी आज़ादी पर संकट होता है।संविधान दिवस पर आपातकाल के समय को याद करना कमोबेश ऐसा ही है जैसे आजादी के संघर्ष को याद करना।

सिंह के अनुसार आपातकाल की पूरी लड़ाई आज़ादी की लड़ाई थी अंतर केवल यह था कि हम अपनों से ही लड़ रहे थे। उस दौर में जिस तरह से आमजन की हालत थी और जेल में उनके लिए संघर्ष की दास्तां लिखी जा रही थी।इसी का परिणाम है कि हम इस दिन को गर्व से मना रहे हैं। केबी सिंह ने युवाओं का आह्वान किया कि आपातकाल से प्रेरणा लेकर भारतीय संविधान के अधिकार और कर्तव्यों को पालन किया जाय।

आपातकाल के दौर में अंडर ग्राउंड रहे रवींद्र चौहान ने हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि संविधान की रक्षा के लिए उस समय लोग खड़े हुए थे। सबकी एक ही आवाज थी अपने संविधान को बनाये रखने की। हम सभी को इसे हमेशा याद रखना चाहिए।

चौहान के अनुसार यदि जिस तरह संविधान को पाने की लड़ाई लड़ी गई उसी तरह आपातकाल में इसकी रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ा। संविधान दिवस पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम सब इसके मूल्यों के अनुसार आचरण करें और इसकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहें।