मुस्लिम मतदाताओं को एनआरसी के बहाने नागरिकता छिनने का डर दिखा रही तृणमूल

मुस्लिम मतदाताओं को एनआरसी के बहाने  नागरिकता छिनने का डर दिखा रही तृणमूल

कोलकाता, 10 फरवरी । पश्चिम बंगाल में आसन्न विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए कमर कस कर मैदान में कूद चुकी है। ममता बनर्जी की पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने उनका साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है जिसकी वजह से तृणमूल को जनाधार खिसकने की आशंका सता रही है। ऐसे में पार्टी अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए मुस्लिम मतदाताओं की ओर देख रही है ।

तृणमूल के अल्पसंख्यक वोट बैंक में किसी भी तरह से सेंध ना लगे इसके लिए पार्टी के अल्पसंख्यक सेल ने पूरी ताकत झोंक दी है। जमीनी हकीकत तलाशने पर पता चलता है कि अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस के प्रचार प्रसार का तरीका अलग है। राज्य के अन्य हिस्सों में ममता बनर्जी सरकार के कार्यों का प्रचार किया जा रहा है लेकिन अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में पार्टी अन्य मुद्दों पर जोर दे रही है। उदाहरण के लिए भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा असम में लगाए गए एनआरसी को लेकर पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को डराया जा रहा है ।

सूत्रों ने बताया है कि अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस के बड़े अल्पसंख्यक नेता रात्रि विश्राम कर रहे हैं और मुस्लिम समुदाय के नेताओं के साथ बैठक कर बता रहे हैं कि अगर भाजपा की सरकार आई तो मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी। इतना ही नहीं तृणमूल के नेता उन्हें इस बात का डर दिखा रहे हैं कि यदि बंगाल में भाजपा की सरकार आई तो मुसलमानों को भगाया जाएगा और उन पर तमाम तरह के अत्याचार किए जाएंगे।

---- नदिया में सबसे पहले शुरू हुआ है प्रचार -

मूल रूप से नदिया जिले में सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस ने इसी तरीके से प्रचार शुरू की है। इसकी वजह यह है कि इसी जिले के नवद्वीप से भारतीय जनता पार्टी ने परिवर्तन यात्रा की शुरुआत की है। भारतीय जनता पार्टी से जुड़े मुस्लिम समुदाय के नेता भी यहां जगह-जगह जा रहे हैं और तृणमूल के खिलाफ मतदान की अपील कर रहे हैं।

दरअसल नदिया उत्तर में 7 विधानसभा केंद्र हैं। इसमें से चार विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता बहुसंख्यक हैं। लोकसभा चुनाव के समय इन सभी क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस को बढ़त मिली थी और इसी वजह से जीत भी हासिल हुई थी। लेकिन इस बार माकपा और कांग्रेस ने गठबंधन कर चुनाव लड़ने की घोषणा की है और इन सभी अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में बड़े जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं को उम्मीदवार बनाने की तैयारी की जा रही है।

इसके अलावा एमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फुरफुरा शरीफ के पीरजादे अब्बास सिद्धकी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इसकी वजह से भी इन क्षेत्रों में अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लग सकती है। यह तृणमूल के लिए शुभ संकेत नहीं है और इसका लाभ आखिरकार भारतीय पार्टी को ही मिलेगा।

नदिया जिले के कृष्णानगर लोकसभा केंद्र में अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या करीब 42 फ़ीसदी है। इनमें से चापड़ा में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 70 फ़ीसदी, पलाशिपाड़ा में 64 फ़ीसदी, नकाशीपाड़ा में 56 फ़ीसदी और कालीगंज विधानसभा क्षेत्र में 60 फ़ीसदी अल्पसंख्यक मतदाता हैं। इन क्षेत्रों में मूल रूप से तृणमूल कांग्रेस एनआरसी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित साजिशों को लेकर प्रचार प्रसार कर रही है।