जगदलपुर : बस्तर दशहरा में महिलाओं के रस्म निभाये बिना रथ परिक्रमा नहीं होती

जगदलपुर : बस्तर दशहरा में महिलाओं के रस्म निभाये बिना रथ परिक्रमा नहीं होती

80 से अधिक पूजा विधानों में से मात्र दो रस्म महिलायें निभाती हैं

इस वर्ष मां दंतेश्वरी के छत्र को बंदूक की सलामी देने महिला पुलिस हुई शामिल

जगदलपुर,11 अक्टूबर । बस्तर दशहरा में रियासत कालीन परंपरानुसार 80 से अधिक पूजा विधान संपन्न किए जाते हैं, हर रस्मों में बलि प्रथा होने की वजह से पुरुषों के द्वारा ही ज्यादातर रस्मों को संपन्न किये जाते है, लेकिन दो रस्म ऐसे हैं जिसे विशेष जाति के महिलाओं के द्वारा ही निभाया जाता है। महिलाओं के द्वारा निभाये जाने वाले रस्म पूरा किये बिना बस्तर दशहरा का मुख्य आकर्षण विशालकाय दुमंजिला रथ परिक्रमा के लिए आगे नहीं बढ़ता है। बस्तर के केवट और मरार जाति की महिलाओं के द्वारा इस रस्म की अदायगी की जाती है। इस रस्म को नजर उतारनी और भोग लगानी रस्म कहा जाता है, जो केवल महिलाओं के द्वारा ही निभाया जाता है। इसके साथ ही इस वर्ष बस्तर दशहरा में प्रशासन के द्वारा मां दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ करने के बाद दी जाने वाली बंदूक की सलामी में सशस्त्र महिला पुलिस को शामिल किया गया है।

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व में तत्कालीन महाराजा पुरुषोत्तम देव ने ही बस्तर के सभी आदिवासी जनजातियों को इस पर्व को संपन्न कराने के लिए अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसमें रथ की लकड़ी काटकर लाने, रथ निर्माण और इसके संचालन में सबसे अधिक लोगों की सहभागिता होती है। इसके अलावा देवी देवताओं के साथ पूजा विधान में शामिल होने में भी बड़ी संख्या में लोगों की सहभागिता होती है। रियासत कालीन यह परंपरा 613 वर्षो से बसतर संभाग के सभी जाति वर्गों के द्वारा इन रस्मों को बखूबी निभाया जा रहा है।

बस्तर दशहरा के दो रस्म केवल महिलाओं के द्वारा ही संपन्न कराया जाता है। इस रस्म के बिना बस्तर दशहरा का मुख्य आकर्षण का केंद्र रथ परिक्रमा भी नहीं हो सकता। नवरात्रि के दूसरे दिन से रथ परिक्रमा की शुरुआत होती है, इस रथ परिक्रमा के दौरान बस्तर के केवट और मरार जाति के महिलाओं के द्वारा बस्तर के महाराजा के द्वारा भेंट किये गए गुलाबी साड़ी का घूंघट बना कर और पूरा श्रृंगार कर मां दंतेश्वरी देवी की नजर उतारी जाती है।

मनीता समरथ और धनेश्वरी पटेल ने बताया कि जैसे ही रथ भगवान जगन्नाथ मंदिर के सामने पहुंचती है। उसके बाद उनके सहयोगी के द्वारा राजा से भेंट स्वरूप प्राप्त गुलाबी साड़ी को पूरी तरह से ढककर व श्रृंगार कर विशालकाय रथ में फूल चढ़ाया जाता है। रथ के ऊपर विराजमान मां दंतेश्वरी का छत्र, व अन्य देवी देवताओं को चना और लाई का प्रसाद भोग लगाया जाता है। इस रस्म को ही नजर उतारनी और भोग लगानी रस्म कहा जाता है। पूरे बस्तर दशहरा पर्व में यह दो रस्म ही ऐसे हैं, जिनमें महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है और इस रस्म को केवल महिला ही निभाती हैं। बस्तर दशहरा पर्व के अन्य रस्मो में बलि प्रथा होने की वजह से पुरुष ही इन रस्मों की अदायगी करते हैं। नजर उतारनी की यह रस्म नवरात्रि के दूसरे दिन से सप्तमी तक रथ परिक्रमा के दौरान की जाती है।

उन्होंने बताया कि रथ परिक्रमा के दौरान दो बार इस रस्म को निभाया जाता है। जैसे ही माता दंतेश्वरी का छत्र रथ के साथ दंतेश्वरी मंदिर के सामने पहुंचता है। उसके बाद इन महिलाओं के द्वारा रथ में फूल चढ़ाकर और भोग लगाकर नजर उतारनी की रस्म अदा की जाती है। इससे पहले रथ परिक्रमा के दौरान देवी की छत्र को रथारूढ़ करने के बाद जगन्नाथ मंदिर के सामने इन रस्मों को पूरा किया जाता है।