पक्षियों को बचाने का संदेश देते हैं शेखावाटी के भित्ति चित्र

पक्षियों को बचाने का संदेश देते हैं शेखावाटी के भित्ति चित्र

रमेश सर्राफ

झुंझुनू, 28 अगस्त । राजस्थान में झुंझुनू जिले के नवलगढ़ कस्बे की आर्टिस्ट लक्ष्मी अपनी कला के माध्यम से नागरिकों को पक्षियों को बचाने का संदेश दे रही है। वहीं स्थानीय क्षेत्र के युवा कलाकार आज भी पक्षी बचाने और पर्यावरण संरक्षण की भावनाएं रंग एवं ब्रश के माध्यम से चित्रण कला सीख रहे हैं। आर्टिस्ट लक्ष्मी ने बताया कि हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई शेखावाटी की हवेली के भित्ति चित्र भी पक्षियों के बचाने का संदेश देते हैं। शेखावाटी के भित्ति चित्रों को देखा जाए तो तकनीक और वैज्ञानिक अध्ययन के बारे में जानकारी देने के लिए दीवारें स्वयं सबसे समृद्ध स्रोत हैं। जिसके अंदर मानव चित्रण से लेकर पशु पक्षी जंगली जानवर तक के चित्रण किए गए हैं।

चित्रों को आकर्षण बनाने के लिए लकड़ी का कोयला और लाल गेरू में लाइनों का उपयोग किया गया था। इन चित्रों को लंबे समय तक शाइनिंग के लिए अक्सर आम पौधे से गोंद, अर्क या अंडों या सरेश, ऊंट की हड्डी से बना गोंद आदि उपयोग में लाया जाता था। शेखावाटी हवेलियों की बाहरी दीवारों पर जयपुर फ्रेस्को का काम गीली प्लास्टर के विरुद्ध गेरू या चारकोल की धूल से ढकी एक तार छाप द्वारा निर्मित निर्माण रेखाओं को दर्शाता है। मुख्य रूप से शेखावाटी का चित्रण का विषय धार्मिक कथाएं, पौराणिक कथाएं, लोक पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक विषय, पक्षी संरक्षण, इरोटिका, मानचित्र चित्र आदि विषयों पर चित्रण किया गया है। लेकिन हाल के वर्षों में सरकार ने इस अनूठी कला विरासत के बारे में जागरूकता फैलाने की दिशा में कुछ प्रयास किए हैं। जयपुर में जवाहर कला केंद्र और दिल्ली में राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय दोनों ने विशेष रूप से अपनी दीवारों पर शेखावाटी भित्तिचित्रों की रचना की है। स्थायी विरासत पर्यटन को इस कला के संरक्षण और संरक्षण दोनों को सुनिश्चित करने के एक तरीके के रूप में देखा जा रहा है। वहीं स्थानीय होटल व्यापारी भी इस कला को संरक्षण करने में लगे हैं। जिससे पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार शेखावाटी के चेजारा कुमावतों ने हवेलियों के निर्माण व चित्रकारी के काम की छाप ऐसी छोड़ी, जो आज भी देखने लायक है। शेखावाटी के अधिकांश भित्ति चित्र लगभग 125 से 150 वर्ष पूर्व के बने हैं। हवेलियों में अराइस की आलागीला पद्धति और दीवार की सूखी सतह पर भी चित्रांकन मिलते है। अराइस की गीली सतह के चित्रों में स्केच (कुराई) तकनीक का सुंदर प्रयोग किया है। अंदर का हिस्सा आज भी सुरक्षित व सजीव है। वहीं देखा जाए तो भित्ति चित्रण की इस समृद्धशाली परंपरा में चित्रकारों का नाम और समाज में एक स्थान था। वे कोई गुमनाम चेहरे नहीं थे। इनमे नवलगढ़ के चितेरे प्रताप बेडवाल, लादूराम बबेरवाल, मांगीलाल घोड़ेला, मंडावा के चितेरे मुरलीधर तोंदवाल, हनुमान सिरसवा, फतेहपुर व रामगढ के चितेरे राधेश्याम तूनवाल, आशाराम तूनवाल थे। इसके साथ रामलाल कुमावत, मूलचंद कुमावत, गजानंद तूनवाल इत्यादि चित्रकारों के नाम भी शामिल हैं। शेखावाटी को ओपन आर्ट गैलरी की पहचान दिलाने में इनके भित्ति चित्रों ने बहुत बड़ा योगदान दिया।

आर्टिस्ट लक्ष्मी ने बताया कि युवा कलाकार सभी बहुत हीं रौचक एवं सकारात्मक तरीके से पेपर पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। कलाकारों द्वारा बनाए जाने वाली पेंटिंग की प्रदर्शनी जन जागृति अभियान के अंतर्गत स्कूल, कॉलेज, आदि स्थानों पर प्रदर्शित की जाएगी तथा सोशल डेवलपमेंट हेरिटेज एंड वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन फाउंडेशन और पक्षिणी फाउंडेशन द्वारा पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इस आयोजन से बच्चों में शेखावाटी के भित्ति चित्र में पक्षियों के संरक्षण के बारे में जानकारी बढ़ेगी।