पालघर-बांस से बनाई गई कलाकृतियों की मांग, आदिवासी युवक ने बनाई कला कृति

मुंबई,14 जनवरी (हि.स.)। पालघर के आदिवासी क्षेत्रों में बांस एक मत्वपूर्ण प्राकृतिक सामग्री है। जिसका प्रयोग अनेक प्रकार से किया जाता है। वास्तव में बांस के बिना ग्रामीण जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। खेत-खलिहान से लेकर घर-आंगन तक प्रत्येक काम में बांस से बनी चीजें प्रयुक्त की जाती हैं।

आदिवासी लोगों द्वारा बने बांस के उत्पादों का उपयोग कई पांच सितारा होटलों और कई घरों में आंतरिक सजावट के लिए किया जा रहा है। पालघर के बांस कला कार्य को धीरे-धीरे पहचान मिल रही है, यह सराहनीय है।

पालघर के आदिवासी संस्कृति और विरासत को चित्रित करने वाली यहां की वारली चित्रकला, एक समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।

तलासरी के उधवा कुंभरपाड़ा के रहने वाले मधुकर दलवी ने चमचमाते डिजाइन की घर व ऑफिस को सजाने संवारने वाली हर चीज बनाई है। यह सारी चीजें किसी कीमती धातु की नहीं बल्कि बांस से बनी हुई है। दलवी ने बांस से बनाई कलाकृतियों पर वारली चित्रकला को काफी खूबसूरती से उकेरा है। जो आदिवासियों की संस्कृति की खूबसूरत झलक पेश कर रही है। आदिवासी समाज से आने वाले मधुकर दलवी एक स्कूल में सुरक्षा रक्षक के रूप में काम करते है। और काम के बाद जो भी खाली समय बचता है। उसमें वह बांस से कलाकृतियों को बनाते है। उनका उद्देश्य है,कि वारली चित्रकला और आदिवासियों की संस्कृति को सभी तक पहुँचाया जाए।

आदिवासी संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले तारपा, ढोल वादक, कामकाजी पुरुष और महिलाओं सहित स्थानीय संस्कृति और रीति-रिवाज इत्यादि दलवी की कलाकृति के प्रमुख केंद्र है। खासतौर पर उन्होंने इन कलाओं को 3 डी का रूप दिया है। जिससे लोग इन्हें बेहद पसंद कर रहे है।

इस वस्तुओं को वह बांस और धारदार आरी और चाकू जैसी सामग्री का उपयोग करके घर के एक कमरे में बनाते है। जिससे आज उनकी झोपड़ी एक एक आर्ट गैलरी में तब्दील हो गई है। दलवी की कला से प्रभावित बहुत से लोग उनकी कलाकृतियों को खरीदने पहुँच रहे है। दलवी का कहना है,कि उन्होंने कुछ कलाकृतियों को नंदुरबार के संग्रहालय में भी प्रदर्शनी के लिए भेजा गया है।

कलाकृतियों को बाजार मिलने से संस्कृति का होगा प्रचार

लोगो ने मांग की है,कि जिले के आदिवासी कलाकारों द्वारा बनाई गई कलाकृतियों को अगर बाजार उपलब्ध करवाया जाता है,तो इनकी आर्थिक स्थितित तो मजबूत होगी ही साथ आदिवासी संस्कृति की झलक भी देश के कोने-कोने तक पहुचेगी। शिक्षिक विनेश धोड़ी ने कहा कि आदिवासियों की कला कृतियों को पर्यटन व्यवसाय से जोड़ दिया जाए तो क्षेत्र की गौरवशाली वारली चित्रकला का प्रचार-प्रसार होगा और इनके कलाकार भी प्रसिद्ध होंगे।