ब्रह्मलीन संत श्रीपाल का जीवन सभी के लिए उच्च आदर्श : महावीर सिंह

हरदोई, 28 जून । संत श्रीपाल (1942-2021) धर्म अध्यात्म के चिन्तक तथा शिव सत्संग मण्डल आश्रम के संस्थापक थे। साधकों एवं सत्संगी जनों ने बताया कि 30 जून 1942 को उनका जन्म ग्राम हड़हा मलिकापुर में हुआ था। उनके बचपन का नाम सेठ था। आरंभ से ही धर्म अध्यात्म में रुचि होने के कारण, उन्होंने वेदों, शास्त्रों और उपनिषदों के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश के जनपद हरदोई के राजस्व ग्राम हुसेनापुर धौकल में सन 1993 में शिव सत्संग मण्डल आश्रम की स्थापना की।

आश्रम में आने वाली 30 जून को संत श्रीपाल को याद करते हुए कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। ब्रह्मलीन संत श्रीपाल के विषय में बुधवार को शिव सत्संग मंडल के मंडल प्रचारक महावीर सिंह ने बातचीत कई बड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ब्रह्मलीन संत श्रीपाल का प्रभाव हम इक्कीसवीं सदी में भी महसूस कर रहे हैं। उनसे प्रेरणा पाकर उन सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक, अंधविश्वासों से लोहा ले रहे हैं, जो दीमक बनकर समाज व धर्म को भीतर ही भीतर खोखला कर रहे हैं। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक जगत की व्याधियों, दुर्बलताओं और त्रुटियों का अध्ययन उन्होंने किया।

मंडल प्रचारक ने बताया कि संत श्रीपाल का चिंतन मूलत: वेद, उपनिषद एवं शास्त्रों पर आधारित था, जो अपने उद्भव काल से ही चिरंतन और शाश्वत समझे जाते रहे हैं। जीवन के सत्य, सत्संग, सुमिरन व परमात्मा को पाने के लक्ष्य को संत एवं सत्संग परंपरा से ही पाया जा सकता है। संत श्रीपाल का जीवन दर्शन हर मानव को दिशा-बोध प्रदान करता रहेगा और वह प्रासंगिक बने रहेंगे।यह ठीक है कि समकालीन समस्याओं से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा। वह मानवतावादी, धर्म संस्कृति के उद्गाता, शांति के नायक, सांप्रदायिक, सद्भावना के उन्नायक और अन्याय, अज्ञान, अभाव और शोषण के विरुद्ध संघर्षरत रहने वाले योद्धा सन्यासी थे।

ध्यान दें तो हमें पता चलता है कि उनका संघर्ष समाज में व्याप्त अंधविश्वासों एवं सामाजिक कुरीतियां से था। ईश्वर एक है, यह पूरा विश्व मानता है। परंतु समय-समय पर जीवन में आने जाने वाले उतार चढ़ाव से सामान्य जन प्रभावित होते रहे हैं। इन्हीं कारणों से चतुर लोगों ने अनेक पूजा पद्धतियों की मनगढ़त रचना रच दी। संत श्रीपाल का स्पष्ट मानना था कि शिवत्व की प्राप्ति से ही अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है। शिवोपासना से मुक्ति और मोक्ष पाया जा सकता है।

वह स्वामी दयानंद द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश से बहुत प्रभावित थे। इसीलिए सत्संगी जनों को हर घर तक सत्यार्थ प्रकाश पहुंचाने की सलाह देते थे। सत्यार्थ प्रकाश ने अंधविश्वास, कुरीतियों, मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बहुदेववाद, अंध श्रद्धा, तीर्थाटन पर जो जमकर प्रहार किया।

उन्होंने अपनी परंपरा, धार्मिक आदर्शों के प्रति आस्था और संस्कृति के प्रति विश्वास जगाया। साथ ही शाकाहार का पक्ष मजबूत करते हुए शाकाहार को जीवन का आधार बताया। जीव हत्या को महापाप बताते हुए, मांस मदिरा सेवन को प्रतिबंधित किया।

उन्होंने भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति सत्संगी जनों को, राष्ट्र की मिट्टी की परंपरा व भारतीय संस्कृति से जोड़कर उन्हें भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़कर सशक्त किया। उनके द्वारा श्याम पट लगाकर सत्संग करने की उत्कृष्ट परम्परा आज भी सुदूर क्षेत्रों में प्रचलित है। माघ पूर्णिमा वर्ष 2021 को वह अंतर्ध्यान हो गए।

लखनऊ मंडल के अध्यक्ष राजेश पांडेय ने बताया कि ब्रह्मलीन संत श्रीपाल जी कहते थे कि आत्म ज्ञान, ज्ञान बाकी सब अज्ञान। इसलिए आत्म चिन्तन कर आत्मनिष्ठ, एक निष्ठ बनें। इस अनमोल जीवन का समग्र कल्याण परमेश्वर से अपनी जीवन धारा को जोड़कर ही किया जा सकता है। शांतिमय, खुशहाल जीवन के लिए ध्यान और भजन इस आध्त्यात्मिक चेतना के मूल स्रोत हैं।

आध्यात्मिक जगत के उच्च प्रतिमान, सनातन संस्कृति एवं संस्कारों के सबल संपोषक, आर्ष विद्या के प्रबल उन्नायक ब्रह्मलीन संत श्रीपाल का सम्पूर्ण जीवन हम सभी के लिए एक उच्च आदर्श है। उन्होंने अपनी आध्यात्मिक आभा से समाज एवं राष्ट्र निर्माण के स्वर को ऊंचाई प्रदान की।

भारत की आध्यात्मिक संवेदनाओं की अभिरक्षा के अतिरिक्त राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता एवं समन्वयवादी पूज्य संत का दिव्य चरित्र, विलक्षण दार्शनिकता और आचरण की अनुपम प्रेरक पारदर्शिता सम्पूर्ण समाज के लिए सत्प्रेरणा सिद्ध हुई है।

सुप्रसिद्ध शिव सत्संग मण्डल आश्रम के संस्थापक ब्रह्मलीन सन्त श्रीपाल जी महाराज की 82वीं जयंती पर उनकी मोक्षदा-अनुग्रहशील चिन्मय दिव्य-सत्ता को सादर प्रणामांजलि !