संसद में विपक्ष की आवाज़ दबाना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा : सिद्धारमैया

संसद में विपक्ष की आवाज़ दबाना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा : सिद्धारमैया

बेंगलुरु, 04 फ़रवरी । कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आरोप लगाया है कि संसद में विपक्ष के नेता की आवाज़ को लगातार दबाने का प्रयास किया जा रहा है, जो लोकतंत्र की भावना के खिलाफ और अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने सत्तारूढ़ दल के इस रवैये की निंदा की है।

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर अपनी पोस्ट में मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी में उल्लिखित तथ्यों का हवाला देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठाए थे। यह पुस्तक 2024 में प्रकाशित होने वाली थी, लेकिन केंद्र सरकार की अनुमति न मिलने के कारण अब तक प्रकाशित नहीं हो सकी है। हाल ही में कारवां पत्रिका में इसके कुछ अंश प्रकाशित हुए हैं।

सिद्धारमैया ने कहा कि जनरल नरवणे ने कारवां में प्रकाशित तथ्यों से इनकार नहीं किया है, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि वे अपनी पुस्तक के प्रकाशन के लिए सरकार की अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। यदि पुस्तक में तथ्यात्मक त्रुटियां या असत्य बातें होतीं, तो केंद्र सरकार को इसके प्रकाशन की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी। सरकार की चुप्पी यह संकेत देती है कि सच्चाई को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पुस्तक में 2020 में चीन सीमा पर हुई झड़पों के दौरान केंद्र सरकार की निर्णयहीनता का उल्लेख है। सरकार की इस दुविधापूर्ण नीति के कारण सशस्त्र बलों को सैन्य और राजनीतिक संकट दोनों का सामना करना पड़ा।

सिद्धारमैया ने कहा कि ऐसे गंभीर मुद्दों पर संसद में चर्चा होना अनिवार्य है। जनता की ओर से सवाल उठाना विपक्ष के नेता राहुल गांधी का कर्तव्य है और उन्होंने वही किया। राहुल गांधी ने न तो देश के खिलाफ और न ही सशस्त्र बलों के खिलाफ कोई बयान दिया है। इसके बावजूद लगातार दो दिनों तक संसद की कार्यवाही स्थगित करना, आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित करना और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विपक्ष के नेता को बोलने का अवसर न देना लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो वह संसद में चर्चा से क्यों भाग रही है। यदि राष्ट्रीय हितों की पूरी तरह रक्षा की गई है, तो संसदीय विमर्श से डरने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा का देश पहले और धर्म पहले का नारा केवल भाषणों तक सीमित रह गया है, जबकि व्यवहार में चुप्पी, पलायन और समर्पण की राजनीति बार-बार सामने आ रही है।